September 13, 2026
‘मन का मानस और राज का कानून’ – चेतना की लाठी और सत्ता की हांडी “जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई!”

संपादकीय:

‘मन का मानस और राज का कानून’ – चेतना की लाठी और सत्ता की हांडी
“जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई!”

देहात की यह पुरानी कहावत आज तमिलनाडु की राजनीति और अदालती चौखट के चक्कर काटते गो-संरक्षण के मुद्दे पर सटीक बैठती है। जब दिल्ली के बड़े कोर्ट से लेकर चेन्नई के गलियारों तक कानून की बहसों के पन्ने पलट रहे थे, तो गांव की चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाते बुजुर्ग ने एक लाइन में पूरी बात का निचोड़ रख दिया—“जैसी नीयत, वैसी बरकत।” असल बात यही है कि जिस इंसान की थाली में कभी जीव की हत्या का अंश नहीं आया, जो खुद शाकाहारी है, वह किसी बेजुबान के दर्द को उसकी आँखों में पढ़ लेता है। देहात में तो गाय को माँ का दर्जा यूँ ही नहीं दिया गया; वह पूरे परिवार का पेट पालती है। ऐसे में एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि जो खुद उस संस्कार और खान-पान की पृष्ठभूमि से नहीं आता, उससे जीव-दया की उम्मीद करना वैसा ही है जैसे “नीम के पेड़ से आम तोड़ने की आस लगाना।” आलोचकों का यह सोचना स्वाभाविक है कि जब थलापति विजय सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के पूर्ण प्रतिबंध के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ‘विशेष अनुमति याचिका’ (SLP) दायर की, तो वह सिर्फ कानून की किताब नहीं बचा रहे थे, बल्कि पर्दे के पीछे से अपनी वैचारिक सोच को रास्ता दे रहे थे। “हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और” वाली बात कहकर जनता का एक वर्ग इसे राजनीतिक नफा-नुकसान और अपनी मूल सोच के अनुरूप उठाया गया कदम मानता है।
लेकिन, राजनीति और सत्ता की हांडी का एक दूसरा रुख भी है। सरकार चलाने वाले इसे “दूध का दूध और पानी का पानी” करने वाली प्रशासनिक मजबूरी बताते हैं। उनका तर्क है कि राज-काज भावनाओं से ज्यादा संविधान की चौखट और 1958 के पुराने कानून के डंडे से चलता है। उनके समर्थकों का कहना है कि हाई कोर्ट का अचानक पूरा बैन लगा देना वैसा ही था जैसे “सिर दर्द की दवा में सिर ही काट देना।” सरकार की दलील थी कि बूढ़े, बीमार और लाचार पशुओं को लेकर जो पुराने नियम बने हैं, उन्हें अचानक बदलने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ताना-बाना बिगड़ जाता और कानून-व्यवस्था की लाठी कमजोर हो जाती। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी कानूनी तकनीकी को देखते हुए हाई कोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगाई। आखिर में, बात घूम-फिरकर वहीं आती है कि “मन चंगा तो कठौती में गंगा।” लोकतंत्र में जनता अपनी सोच और संस्कारों के तराजू पर हर राजा के फैसले को तौलती है। जहाँ एक तरफ इसे व्यक्तिगत पृष्ठभूमि और धार्मिक सोच के चश्मे से देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसे राजधर्म और कानूनी संतुलन का नाम दिया जा रहा है। पर सच यही है कि देश की आत्मा आज भी बेजुबान के संरक्षण में ही अपनी भलाई देखती है, भले ही सत्ता की राजनीति उसे किसी भी कानून के फेर में उलझाए रखे।

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प्रमोद कुमार तिवारी
प्रमोद कुमार तिवारी

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