September 14, 2026
हिंदी को संरक्षण नहीं, प्रतिष्ठा चाहिए

हर वर्ष 14 सितंबर आता है और हम हिंदी दिवस मनाते हैं। सरकारी कार्यालयों में हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़े और हिंदी दिवस के आयोजन होते हैं। भाषण दिए जाते हैं, प्रतियोगिताएँ होती हैं, पुरस्कार बाँटे जाते हैं और हिंदी के गौरव का गुणगान किया जाता है। लेकिन एक सवाल बार-बार मन में उठता है—जिस देश में करोड़ों लोग हिंदी बोलते, समझते और अपने दैनिक जीवन में इसका इस्तेमाल करते हैं, उस हिंदी को आखिर संरक्षण की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? क्या यह अपने आप में एक विडंबना नहीं है? हिंदी भाषी समाज में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अलग से अभियान चलाना कुछ-कुछ ऐसा लगता है जैसे किसी नदी के किनारे खड़े होकर नदी के अस्तित्व को बचाने के लिए सम्मेलन किया जाए। समस्या हिंदी के अस्तित्व की नहीं है। समस्या यह है कि हिंदी को उसके वास्तविक सामर्थ्य के अनुरूप प्रतिष्ठा और उपयोग का स्थान नहीं मिल पाया है। घर में हिंदी है, बाजार में हिंदी है, सिनेमा में हिंदी है, करोड़ों लोगों के संवाद में हिंदी है; लेकिन जैसे ही हम उच्च शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, न्याय, रोजगार और आधुनिक ज्ञान की दुनिया में प्रवेश करते हैं, हिंदी का प्रभाव अचानक कम होता दिखाई देता है। तो फिर सवाल हिंदी दिवस मनाने का नहीं, हिंदी को उपयोगी और सक्षम बनाने का है। हिंदी को हर साल एक दिन याद करने से बेहतर होगा कि उसे पूरे वर्ष शासन और नागरिक जीवन की प्रभावी भाषा बनाने की दिशा में काम किया जाए। हिंदी को पुरस्कारों और प्रमाणपत्रों से नहीं, बल्कि कामकाज की भाषा बनाकर सम्मान दिया जाए। यहीं से एक अलग तरह की नीति पर विचार किया जा सकता है। क्यों न केंद्र सरकार राज्यों को मिलने वाले कुछ निर्धारित विकास अथवा प्रशासनिक प्रोत्साहन फंड का एक छोटा-सा हिस्सा भाषा के वास्तविक उपयोग से जोड़े? मसलन केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को निर्धारित की जाने वाली निधि (फंड) के आवंटन में सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को एक मानदंड के रूप में शामिल किया जाए। जिस राज्य सरकार द्वारा अपने कुल सरकारी कामकाज का 70 प्रतिशत से अधिक कार्य हिंदी भाषा में किया जाता है, उसे निर्धारित केंद्रीय निधि का 100 प्रतिशत आवंटन किया जाए। वहीं, यदि किसी राज्य में सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग निर्धारित 70 प्रतिशत से कम है, तो केंद्रीय निधि के 1 प्रतिशत हिस्से का उपयोग केंद्र सरकार अपने स्तर पर करे। इस 1 प्रतिशत राशि के उपयोग एवं कार्यान्वयन के लिए केंद्र सरकार द्वारा एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए तथा उसके कार्यों की निगरानी एवं समीक्षा केंद्र सरकार द्वारा स्वयं की जाए। इस व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी कामकाज में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग को प्रोत्साहित करना तथा राज्यों में राजभाषा हिंदी के प्रभावी एवं व्यावहारिक उपयोग को बढ़ावा देना होगा।

See also  ‘मन का मानस और राज का कानून’ – चेतना की लाठी और सत्ता की हांडी “जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई!”

Author Profile

प्रमोद कुमार तिवारी
प्रमोद कुमार तिवारी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *